भागवत ही भगवान का सत्य रूप:राघवेंद्र शास्त्री


देवरिया टाइम्स

वीजापुर झंगटौर में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन कथावाचक पं0 राघवेंद्र शास्त्री ने कहा कि भागवत को भगवान का सत्य रूप कहा गया है। भगवान सत्य रूप में हमेशा रहते हैं। सत्य का आशय है भगवान सबके हैं, भागवत सबकी है।
उन्होंने कहा कि चिंता मत करो, क्योंकि जिसने तुम्हें इस दुनिया में भेजा है उसे आपकी ज्यादा चिंता है।
जिसके ऊपर भगवान का हाथ है, उसे कोई दुःख कैसे हो सकता है।
चौथे दिन के कथा में उन्होंने श्रोताओं को समुन्द्र मंथन की कथा सुनाई।


उन्होंने कहा कि समुद्र के मंथन करने पर सर्वप्रथम कालकूट नामक विष निकला। जिसे भगवान भोलेनाथ ने स्वीकार किया। इसके बाद 13 रत्न निकले। अमृत के निकलते ही राक्षस और देवता आपस में लड़ने लगे। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके देवताओं को अमृत पान कराया। प्रभु नहीं चाहते थे कि राक्षस अमृत का पान करें, क्योंकि राक्षस अमृत का पान करने के बाद और अत्याचारी हो जाते। देवताओं को अमृत प्रभु ने इसलिए दिया क्योंकि वह सभी पर कृपा करते हैं। समुद्र मंथन का आशय यह है कि मानव जीवन में भी कई उतार-चढ़ाव आते हैं जैसी आपकी मनोवृति होगी वैसा ही स्वरूप आपके सामने आएगा।

अच्छे कर्म करने पर सब कुछ अच्छा होता है वही गलत का कर्म करने पर वैसा ही जीवन हो जाता। राजा बलि की कथा कहते हुए उन्होंने कहा कि राजा बलि ने सैकड़ों यज्ञ किए। यज्ञ के प्रभाव से वह तीनों लोगों का स्वामी बन गया। राजा बलि के जैसा दूसरा दानवीर नहीं हुआ। भगवान ने राजा बलि को अपनी शरण में लेने के लिए वामन का रूप धारण किया और राजा बलि से तीन पग धरती की मांग की। इसके बाद प्रभु ने तीनो लोक को अपने दो पग से नाप लिया और तीसरा पग राजा के बलि के सिर पर रख दिया।
कथा श्रवण में गुरु भगवानदास शास्त्री जी,यजमान विन्ध्वासिनी देवी,कृष्णाकान्त मिश्र,भूपेंद्र मिश्र,अनिल मिश्र,अजय दुबे वत्स,रविशंकर मिश्र,अनूप उपाध्याय,बृजेश दुबे,सचिन्द्र दुबे,राकेश दुबे,विन्द्रेश मिश्र,सन्तोष मिश्र,श्रीगोपाल, हृदयानंद मिश्र,नागेंद्र मिश्र,श्यामदेव,सुनील मिश्र,प्रवीण, आदर्श,अंश आदि ने कथा का रसपान किया।

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